सैकड़ों वर्षों का संघर्ष, सत्य-पथ पर श्रीराम-नाम रूपी आंदोलन की आग को जलाए रखने की वीरता और हमारे सनातन के संयम का फल है कि 22 जनवरी 2024 को श्रीरामलला की जन्मभूमि अयोध्या में हमारे आराध्य प्रभु श्रीरामलला की प्राण-प्रतिष्ठा को हम अपनी आंखों के सामने होते देख पाए। यह मंदिर इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह करोड़ों सनातनियों की आस्था का केंद्र है, इसलिए तो लाखों राम-भक्तों ने संघर्ष के क्रम में अपने प्राणों की आहुति दे दी।
500 वर्षों के मंदिर संघर्ष में कितने कालखण्ड आए, विदेशी आक्रांता आए, अंग्रेज़ी शासन आए, स्वतंत्रता के बाद कई सरकारें आईं, कई प्रधानमंत्रियों के शासनकाल आए, लेकिन अंततः जिस प्रधानमंत्रित्व-काल में यह विषय साकार रूप में प्रतीत हुआ, वह श्रीमान नरेंद्र मोदी जी की वर्तमान सरकार है।
इसलिए देश की संस्कृति और प्रभु श्रीराम के आदर्शों पर कार्य कर रही संस्था ‘रामायण रिसर्च काउंसिल’ आ. नरेंद्र मोदी जी के प्रति आभार और हृदय से धन्यवाद ज्ञापित करती है।
रामायण रिसर्च काउंसिल, अयोध्या में श्रीराम मंदिर एवं इसके संघर्ष पर वर्ष 2018 से ही कार्य करती रही है। श्रीराम मंदिर संघर्ष पर आधारित, एक ग्रंथ ‘श्रीरामलला- मन से मंदिर तक’ को भी काउंसिल ने एक वृहद शोध-ग्रंथ के रूप में तैयार किया है। माननीय प्रधानमंत्री जी का विशेष धन्यवाद, जिन्होंने इस ग्रंथ के लेखन-कार्य के दौरान वर्ष 2021 में काउंसिल के बोर्ड ऑफ ट्रस्टी के अध्यक्ष श्री अजय भट्ट (वर्तमान सांसद) तथा काउंसिल के महासचिव श्री कुमार सुशांत को समय देकर इस विषय को अच्छी तरह समझा और अपना अमूल्य मार्गदर्शन भी प्रदान किया। उन्हीं से मिली प्रेरणा का परिणाम है कि यह ग्रंथ अब हिन्दी भाषा में पूर्ण हो चुका है तथा हिन्दी के अलावा कई अन्य अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में इसका अनुवाद भी किया जा रहा है। ग्रंथ 1200 से अधिक पृष्ठों का है। मा. प्रधानमंत्री जी को इस ग्रंथ के पूर्ण होने की सूचना भी प्रेषित की गई है। साथ ही, काउंसिल ‘अ लेटर टू नरेंद्र मोदी’ के विषय को साकार रूप देने के प्रति प्रतिबद्ध है, लेकिन हम ‘अ लेटर टू नरेंद्र मोदी’ पर कार्य क्यों कर रहे हैं, यह समझना बहुत आवश्यक है।
22 जनवरी 2024 के उस प्राण-प्रतिष्ठा वाले क्षण और उस दिन को जब हम याद करते हैं तो आज भी प्रतीत होता है कि जैसे कोई स्वप्न देख रहे हों। वो दिन ऐसा था, मानो राम-राज्य आ गया हो। पूरा देश नहीं, विश्व राममय था। रामभक्ति में सब सराबोर थे। हम सबने भगवान श्रीरामलला के जन्म-स्थान पर संघर्ष की कहानी को बचपन में अपने-अपने बड़े-बुजुर्गों से सुना था और वे बड़े-बुजुर्ग बताते थे कि उन्होंने भी अपने पूर्वजों से इसी गाथा को सुन रखा था। हमारे आराध्य प्रभु के जन्म-स्थान अयोध्या में मंदिर के लिए सैंकड़ों वर्षों के संघर्ष पर अब जाकर विराम लगेगा, यह हम सबके कल्पना से परे था। हम अपनी नम आंखों से देख पाएंगे, यह सोचा न था। हम यह सोचते और लिखते हुए आज भी भाव-विह्वल हो जाते हैं।
माननीय प्रधानमंत्री जी, काउंसिल परिवार ही नहीं, हर सनातनी के चिंतन में होगा कि जिस समय आप प्राण-प्रतिष्ठा के लिए अयोध्या परिसर में गर्भ-गृह की ओर बढ़ रहे थे तो करोड़ों सनातनियों का हृदय धड़क रहा था। जैसे ही प्राण-प्रतिष्ठा का समय हुआ, शंख बजा, लगा पूरा विश्व गूंज उठा। जो जहां जिस तरह टीवी-स्क्रीन के सामने, पूजा पर, या मंदिर के सामने था, वहीं तुरंत उठ खड़ा हुआ। आंखें नम हो गईं। कई तो चिघाड़ कर रोने लगे। ये वो चिघाड़ थी, जिसके पीछे हमारे आराध्य प्रभु के लिए उनके बेघर रहने का एक दर्द था और अब उनके लिए मंदिर निर्माण की खुशी थी। पूरा देश अपने भगवान का उनके नए घर में स्वागत करने लगे। जय श्री राम के गूंज से विश्व गूंज उठा। गली-मोहल्ला-सड़क-चौराहा-बाज़ार समेत हर घर में एक अलग रौनक थी। शाम में हर घर में दीपावली मनाई गई। सबने अपने-अपने स्थान से भगवान का उनके घर में आने का स्वागत किया।
हम सनातन में प्रारब्ध को मानते हैं। इसका तात्पर्य है कि नियति एवं विधाता सबके पूर्व कर्मों के हिसाब से सब निर्धारित कर रखा होता है। मा. प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के हाथों श्रीरामलला की अयोध्या में प्राण-प्रतिष्ठा हुई। नियति ने यह सैंकड़ों वर्ष पहले ही तय कर रखा था कि उन्हीं के हाथों प्राण-प्रतिष्ठा होनी है। निस्संदेह, उन पर भगवान की असीम कृपा है। इस क्षण को गौरवशाली बनाने के लिए उनके नेतृत्व में जो कार्य हुए, पूरा सनातन परिवार इसकी जितनी प्रशंसा करे, कम है।
ये रामलला के बाल-रूप विग्रह-मात्र का ही प्राण-प्रतिष्ठा-कार्यक्रम नहीं था, अपितु भारत और महान भारतीय संस्कृति की अस्मिता, उसके स्वाभिमान और गौरव की पुनर्स्थापना का अतुलनीय दिवस था। ईश्वरीय विधान ही है कि हमारे आराध्य श्रीराघवजी ने इसके लिए मा. प्रधानमंत्री जैसे एक ऐसे तपस्वी भक्त का चयन किया। यह संदेह से परे होगा कि यह कृपा जिन पर भी होती, वह आधुनिक भारत की सांस्कृतिक पुनर्चेतना का निर्विवाद अग्रदूत ही होते, उनके व्यक्तित्व में समर्थ शासक, विलक्षण प्रशासक और निरभिमानी उपासक निरन्तर दृष्टिगोचर ही रहते। हमें गर्व कि वह कृपा श्री नरेंद्र मोदी जी पर हुई है।
प्राण-प्रतिष्ठा के दिन पूज्य श्री गोविंद गिरि जी महाराज ने पंचामृत से प्रधान सेवक (मा. प्रधानमंत्री जी) का 11 दिनों के महाअनुष्ठान का व्रत सम्पन्न करवाया तो ऐसा प्रतीत हुआ, मानो वे भारतवर्ष की इस पावन धरा के इस पुण्यात्मा पुत्र के उपवास की पूर्णाहुति में सम्पूर्ण सत्पुरुषों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। यही कारण है कि हम माननीय प्रधानमंत्री जी के नाम से ही इन धन्यवाद-पत्रों को लिखने हेतु आमंत्रण दे रहे हैं। यही कारण है कि श्री नरेंद्र मोदी जी को धन्यवाद ज्ञापित करते हुए 22 जनवरी 2024 को अयोध्या में हुई प्राण-प्रतिष्ठा के दिवस को हम जीवंत बनाना चाहते हैं।
अयोध्या का प्रभु श्रीराम का मंदिर राष्ट्र-मंदिर है। प्रभु श्रीराम राष्ट्र की संस्कृति हैं। श्रीराम राष्ट्र के प्राण हैं। श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी ने एक बार संसद में कहा था कि श्रीराम मंदिर का निर्माण राष्ट्रीय स्वाभिमान का मुद्दा है। श्रीरामलला के मंदिर का निर्माण का अर्थ ‘भारत का नवनिर्माण’ है। अयोध्या में यह भव्य श्रीरामलला का मंदिर हमारे लिए सौभाग्य का प्रतीक भी लेकर आया है। इस कालखण्ड से एक नए भारत की परिकल्पना को हम देख पा रहे हैं, जहां हिन्दुत्व का स्थान निर्णायक भूमिका में है। आज सनातन समाज एकजुट हो रहा है। वर्षों बाद आज का भारत अपने खोये हुए गौरव के प्रकाश को देख रहा है। अतीत के हर दंश से मुक्ति पाता हुआ नए इतिहास का सृजन कर रहा है। आज से हजार वर्ष बाद भी लोग 22 जनवरी 2024 की तारीख को याद करेंगे, तब आज के इस पल की चर्चा करते नहीं थकेंगे। जिन-जिन प्रयासों के बल पर श्रीरामलला अपने मंदिर में विराजमान हो पाए और हमें इस स्वर्णिम, अद्भुत एवं अविस्मरणीय क्षण को जीने का अवसर दिया, उन्हें हम कोटि-कोटि आत्मीय अभिनन्दन करते हैं।
अयोध्या धाम में श्रीरामलला की प्राण-प्रतिष्ठा का अलौकिक क्षण हर किसी को भाव-विभोर करने वाला है। इसे अपने शरीर में रहते देख पाना, हम सबका परम सौभाग्य है। लेकिन चिंता है, ये पल कहीं खो न जाए। समय के लिए इसे भुला न दिया जाए। यह चिंता इसलिए है, क्योंकि जिस इंटरनेट और सर्च इंजन पर हमारी सारी जानकारी टिकी है, वह समय के साथ पुरानी सामग्रियों को बहुत पीछे करता है। हम आज से 100 वर्ष पुराने विषय को तलाशें, तो मुश्किल होगा। उसी तरह आज से 100 वर्ष बाद क्या होगा ? उस समय सारे टीवी चैनल्स, मीडिया-रिपोर्ट्स भी बमुश्किल ही मिलेंगी। नए विषय ट्रेंड्स में होंगे। पुस्तकें और कुछ दस्तावेज ही होंगे जो कई दशकों पहले हुई घटनाओं का वर्णन करेंगे। कई बार हमने राजनीतिक घटनाक्रमों के चलते कलम को भी गिरवी होते देखा है। ऐसे तथ्यों और कड़वे विचारों को ध्यान में रहते हुए ही हमने प्रभु श्रीरामलला के जन्म-स्थान पर मंदिर के संघर्षों की गाथा को ग्रंथ ‘श्रीरामलला- मन से मंदिर तक’ में संकलित किया है और अब 22 जनवरी 2024 को श्रीरामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के दिवस को इस ब्रम्हाण्ड के मानस पटल पर जीवंत रखने की दृष्टि से ही इस विषय की संकल्पना तैयार की है और मा. प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नाम 11,111 धन्यवाद-पत्रों का समायोजन, संकलन और इसे पत्र-ग्रंथ का स्वरूप देकर ‘अ लेटर टू नरेंद्र मोदी’ के नाम से तैयार करने का संकल्प लिया है।